हिमवंती मीडिया/शिलाई

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को अक्सर “देवभूमि” कहा जाता है, और इस बात की पुष्टि शनिवार को द्राबिल में हुए एक अद्भुत धार्मिक समारोह से हुई। पहली बार छत्रधारी चालदा महासू महाराज ने टौंस नदी पार कर हिमाचल में प्रवेश किया, जो इस क्षेत्र के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था। शनिवार की शाम करीब 6 बजे नदी पार करने के बाद, महाराज की पालकी द्राबिल गांव की ओर बढ़ी। सड़कों के दोनों ओर हजारों श्रद्धालु फूल‑मालाएँ, जयकारों और ढोल‑नगाड़ों के साथ उनका स्वागत कर रहे थे। भीड़ में अनुमानित 30‑40 हजार लोग शामिल थे, जबकि तापमान लगभग 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, फिर भी लोग पूरी रात ठंड में खड़े रहे। द्राबिल में महाराज का स्वागत उनके बड़े भाई बौठा महासू महाराज ने किया। इस अवसर पर नाहन के विधायक अजय सोलंकी और उद्यो मंत्री हर्षवर्धन चौहान सहित कई जनप्रतिनिधियों भी पालकी के साथ सड़क पर खड़े होकर भक्तों के साथ रात मौजूद रहे।

रविवार को दोपहर 2 बजे महाराज द्राबिल से पशमी के लिए रवाना हुए। जहाँ एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना थीं। पश्मी गांव के लोग बेसब्री से इंतजार कर थे कड़ाके की ठंड में सभी श्रद्धालु सुबह के 4 बजे तक बैठे रहे। देवता पहुंचने के बाद 4बजे से भंडारा शुरू हुआ और सभी श्रद्धालु ने ग्रहण किया। इस विशाल समारोह में स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा और ट्रैफ़िक व्यवस्था के लिए विशेष उपाय किए हैं। चालदा महासू महाराज का यह पहला हिमाचल प्रवेश न केवल एक धार्मिक घटना है, बल्कि सदियों पुरानी देव परम्परा और लोक आस्था की जीवंत तस्वीर भी प्रस्तुत करता है। इस दौरान सांस्कृतिक संध्या भी हुई जिसमें हिमाचल से मुख्य कलाकार विक्की चौहान अजय चौहान और उत्तराखंड से भी अन्य कलाकार थे जिन्होंने रात भर खूब समा बांधा।