हिमवंती मीडिया/पांवटा साहिब
सावन की शिवरात्रि के पावन अवसर पर पांवटा साहिब से एक भावुक, आस्था से ओतप्रोत कांवड़ यात्रा हरिद्वार से गंगाजल लेकर हिमाचल की सबसे पवित्र जगह चूड़धार (शिरगुल महाराज की तपोस्थली) की ओर रवाना हुई। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि उसमें सम्मिलित हर एक भक्त के लिए जीवनभर का एक आध्यात्मिक अनुभव भी बन गई। इस भक्तिमय यात्रा में पांवटा साहिब, माजरा, हरिपुरधार, नाहन, चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों से लगभग 40-45 श्रद्धालुओं ने भाग लिया। 21 जुलाई को पांवटा साहिब से प्रारंभ हुई यह यात्रा हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर चूड़धार की कठिन पहाड़ी राहों से होते हुए 23 जुलाई को सावन शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक के साथ सम्पन्न हुई। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चूड़धार की भूमि वही स्थान है जहाँ शिरगुल महाराज ने एक राक्षस का संहार कर क्षेत्र को भयमुक्त किया और तपस्या में लीन होकर अंततः स्वयं को शिवलिंग में लीन कर अंतर ध्यान हो गए। आज भी यहाँ प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है, जिसे शिवजी के साक्षात रूप में पूजा जाता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को वहाँ निवास कर रहे एक महात्मा जी ने यह जानकारी भी दी कि स्वामी श्यामानंद जी सन 1971 में बाहर से इस पवित्र स्थान पर आए थे, और यहाँ ध्यान, तप और सेवा के माध्यम से धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाया। उन्होंने चूड़धार क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और सेवा भाव से जुड़ने की प्रेरणा दी। स्वामी जी ने 2005 में चूड़धार में ही समाधि ली, और उनका योगदान आज भी वहाँ के वातावरण में अनुभूत होता है।
पूरी यात्रा के दौरान घने जंगल, ऊँचे पर्वत, शीतल हवाएँ, और भक्तिमय वातावरण ने यात्रियों को एक अलौकिक ऊर्जा और आनंद प्रदान किया। यात्रा के दौरान चूड़धार की उस विशाल चट्टान पर भी विशेष पूजा और शंखनाद किया गया, जिसे “चूड़ी का परिवार” कहा जाता है और जो इस पवित्र स्थल की पहचान है।
जलाभिषेक के उपरांत सभी कांवड़ियों अपने-अपने क्षेत्रों में स्थित शिव मंदिरों में गंगाजल अर्पित करने निकल पड़े। पांवटा साहिब से आए एक जत्थे ने अपनी यात्रा का समापन पातालेश्वर मंदिर, पावन पुतलियों में किया, जहाँ पर पाण्डव कालीन प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है। रात लगभग 11:45 बजे, जत्था मंदिर पहुँचा और वहाँ चल रही सावन शिवरात्रि की विशेष रात्रिकालीन पूजा व आरती में भाग लेकर पवित्र जल अर्पित किया। इस अवसर पर कुछ भक्तों ने रात्रि 1 बजे तक मंदिर परिसर में आयोजित भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया और इसके बाद भक्तिभाव के साथ अपने-अपने घरों को लौटे। यह यात्रा सिर्फ आस्था का नहीं, जीवन के संतुलन का भी प्रतीक बनी। आज के समय में जब जीवन भागदौड़ और व्यस्तताओं से भरा हुआ है, ऐसे में यह याद दिलाना जरूरी है कि: काम के साथ-साथ भक्ति और आत्मिक जुड़ाव भी आवश्यक है। आधुनिक जीवनशैली में आध्यात्मिकता का होना हमें भीतर से मजबूत करता है। यह संतुलन ही हमें मानसिक शांति, सामाजिक सौहार्द और सच्चे सुख की ओर ले जाता है। यह यात्रा नहीं, शिव से मिलन की अनुभूति थी। शिरगुल महाराज की तपोभूमि, स्वामी श्यामानंद जी का पुण्य स्मरण और भोलेनाथ का आशीर्वाद हर यात्री की आत्मा को गहराई तक स्पर्श कर गया।
