हिमवंती मीडिया/नाहन(मन्नत)
किसी भी अस्पताल में अक्सर मेडिकल एमरजेंसी की बात होती है। मौत चाहे सड़क दुर्घटना से हो. हार्ट अटैक से हो या कोई अन्य गंभीर बीमारी के कारण पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था तत्काल सक्रिय हो जाती है। लेकिन जब बात आती है डेडबॉडी के पोस्टमार्टम की तो चिकित्सकों को भी कई तरह के प्रोटोकॉल फॉलो करने होते हैं जिसमें कभी कोई सरकारी छुट्टी, माह का दूसरा शनिवार या रविवार के कारण पोस्टमार्टम में बाधा आती है जिस कारण मृतक के परिजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है और कभी-कभी मृतक की डेडबॉडी लेने के लिए एक या दो दिन का इंतजार भी करना पड़ता है लेकिन एक ऐसा ही मामला जब नाहन के सरकारी अस्पताल में आया जहाँ किसी परिवार का एक नौजवान व्यक्ति जिसे पांवटा साहिब से नाहन लाया गया था दुनिया को अलविदा कह गया, के पोस्टमार्टम में कुछ कानूनी प्रक्रिया को पूरी करने के चलते जब देरी हो रही थी तो परिजनो ने जब रोते बिलखते अस्पताल प्रबन्धन डेडबॉडी जल्दी मिलने की गुहार लगाई और बताया कि हमें लगभग 200 किलोमीटर शिमला जनपद के धार चांदना गाँव जाना है। तब सोशल एमरजेंसी का दायित्व निभाती नाहन के डॉ. वाई.एस. परमार मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. संगीत विल्लों समाने आई और उन्होंने तुरंत पोस्टमार्टम की कार्रवाई कर शव परिजनों के सुपुर्द कर दिया। प्रशासनिक दृष्टि से यदि वह चाहती तो किसी अन्य चिकित्सक को जिम्मेदारी सौंप सकती थी। लेकिन उन्होंने स्वयं मौके पर पहुंचकर प्रक्रिया पूरी की, जिससे शोकग्रस्त परिवार को अनावश्यक प्रतीक्षा न करनी पड़े। ऐसे समय में चिकित्सा व्यवस्था की संवेदनशीलता केवल इलाज से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी मापी जाती है। इन्हीं परिस्थितियों के बीच डॉ. वाई एस. परमार मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, नाहन की प्राचार्य डॉ. संगीत ढिल्लों का कार्य चर्चा का विषय बना हुआ है। संस्थान की मुखिया होने के बावजूद वे कई अवसरों पर स्वयं डैड हाऊस पहुंचकर पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी करती है।
ऐसा ही एक अन्य मामला भी सामने आया था, जिसमें एक महिला, जिसने लगभग 25 दिन पहले ही शिशु को जन्म दिया था, उसकी असामयिक मृत्यु हो गई। शाम के समय शव मेडिकल कॉलेज पहुंचा। माह के द्वितीय शनिवार का अवकाश का दिन होने के कारण पोस्टमार्टम में विलम्ब के चलते डॉ ढिल्लों ने मानवता का परिचय देते हुए स्वयं डैड हाऊस पहुँचकर पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी करवाई। उनका यह निर्णय मानवीय दृष्टिकोण से निश्चित रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यही वह बिंदु है, जहां नेतृत्व और प्रबंधन के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। प्रबंधन जिम्मेदारियां बांटता है, जबकि नेतृत्व कई बार स्वयं जिम्मेदारी उठाता है। खास बात यह भी है कि पीजीआई चंडीगढ़ में भी छुट्टी के दिन पोस्टमार्टम नहीं होता है, ऐसे में शव का पोस्टमार्टम नाहन मेडिकल कॉलेज में करने से इंकार नहीं किया जाता है। किसी भी संस्थान का प्रमुख यदि केवल आदेश देने तक सीमित न रहकर आवश्यकता पड़ने पर स्वयं मैदान में उतरता है, तो वह अपने सहयोगियों के लिए भी एक कार्य संस्कृति स्थापित करता है। इससे यह संदेश जाता है कि सेवा केवल पद की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक मानवीय दायित्व भी है।
